rahul dwivedi54
Tuesday, December 6, 2011
श्री कृष्ण
तिरछा है किरीट कसा उसमें
तिरछा वनमाल पडा रहता है
तिरछी कटि काछनि है जिसमें
सुख सिंधु सदा उमड़ा रहता है
तिरछे पद कुञ्ज कदम्ब तरे
तिरछे दृग तान खड़ा रहता है
किस भांति निकाले कहो दिल से
तिरछा घनश्याम अड़ा रहता है .....
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