Tuesday, December 6, 2011

श्री कृष्ण






तिरछा है किरीट कसा उसमें
तिरछा वनमाल पडा रहता है

तिरछी कटि काछनि है जिसमें
 सुख सिंधु सदा उमड़ा रहता है

तिरछे पद कुञ्ज कदम्ब तरे
 तिरछे दृग तान खड़ा रहता है

किस भांति निकाले कहो दिल से
तिरछा घनश्याम अड़ा रहता है .....

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